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माँ आशापुरा माता

आशापुरा माता, माता दुर्गा का अद्भुत रूप हैं, जो अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करने वाली और संकट के समय रक्षक के रूप में विख्यात हैं। माता जी की उपासना राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र सहित कई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है।

माता जी का नाम ही आशा और आशीर्वाद का प्रतीक है। ऐसा विश्वास है कि जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ माता जी के दरबार में आते हैं, उनकी हर मनोकामना पूरी होती है। माता जी की कृपा से जीवन के रोग, संकट, गरीबी और अन्य कठिनाइयों से मुक्ति मिलती है।

भक्ति में विश्वास और श्रद्धा में शक्ति है। आशापुरा माता की असीम कृपा से हर भक्त का जीवन सुख, समृद्धि और शांति से परिपूर्ण होता है।
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माँ महालक्ष्मी माता

महालक्ष्मी माता को धन, समृद्धि, वैभव और सौभाग्य की देवी माना जाता है। वह भगवान विष्णु की शक्ति और अंश हैं और संसार के कल्याण के लिए देवी लक्ष्मी का स्वरूप धारण करती हैं। उनका आश्रय पाने से धन, सुख, शांति और सफलता की प्राप्ति होती है।

महालक्ष्मी माता का रूप अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और आलोकमय है। उन्हें अक्सर सिंहासन पर विराजमान, चार हाथों में कमल, गदा, शंख और वरमुद्रा लिए हुए दर्शाया जाता है। उनका यह स्वरूप बताता है कि माता धन और समृद्धि देने वाली हैं और साथ ही भक्तों को बुराई और दरिद्रता से बचाती हैं।

उनकी पूजा विशेष रूप से दीपावली, शरद पूर्णिमा और श्री महालक्ष्मी यंत्र पूजा के अवसर पर की जाती है। भक्त माता को प्रसन्न करने के लिए सत्कर्म, भजन, व्रत और दान करते हैं।

माता महालक्ष्मी की महिमा अति महान है। उनके आशीर्वाद से व्यवसाय, गृहस्थ जीवन और आध्यात्मिक उन्नति सभी में सफलता मिलती है। कहा जाता है, जो व्यक्ति सच्चे मन से माता की भक्ति करता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य आता है।
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माँ अम्बा माता

अम्बा माता, जिन्हें शक्ति और माता का रूप माना जाता है, हिन्दू धर्म में एक प्रमुख देवी हैं। ‘अम्बा’ का अर्थ है “माता”, और इन्हें सर्वशक्तिमान मां के रूप में पूजा जाता है। अम्बा माता शक्ति, साहस और रक्षकत्व की प्रतिक हैं।

उन्हें अक्सर शेर या सिंह पर सवार, कई हाथों में त्रिशूल, खड़्ग और चक्र लिए हुए दर्शाया जाता है। उनका यह रूप यह बताता है कि माता शत्रुओं का विनाश करती हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।

अम्बा माता अपने भक्तों पर सदैव करुणा और कृपा बरसाती हैं। उनके दरबार में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति शक्ति, साहस और आशिर्वाद से परिपूर्ण होकर लौटता है।
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माँ पद्मावती माता

श्री मार्कण्डेय पूराण के दुर्गा सप्तशती में उल्लेख मिलता है
ॐ नागाधीश्वर विष्टशं फणिफणों तसोरुरत्नावली
भास्वदेहलता दिवाकरनि भां नैत्र त्रयोद् भासिताम् I
माला कुम्भ कपाल नीरजकशं चन्द्रार्ध चूडां पशं
सर्वज्ञेश्वर भैरवाकं निलयां पद्मावतीं चिन्तये II
जो देवी नागराज के आसान पर विराजमान है नागों के फणों से सुशोभित होने वाली मणियों की विशाल माला से उद्भासित है I सूर्य के समान उनका तेजोमय मुख है तीन नैत्र वाली देवी है जिनका मुकुट अर्धचन्द्राकार है जो सर्व ज्ञेश्वर भैरव के अंक में निवास करनेवाली एवं अपने भक्तों पर उत्कर्ष देने वाली देवी को पद्मावती देवी के नाम से जाना जाता है
जीन शासन में भी शक्ति तत्त्व के रूप में पूजित देवी को पद्मावती के रूप में जाना जाता है I देवी पूराण में धूमलोचन को केवल अपने शब्द से ही भस्म करने वाली शक्ति रूप में वर्णित किया गया है I भगवती लक्ष्मी का स्वरुप भी माना गया है I विशेष रूप से द्रव्य लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए पद्मावती देवी की आराधना का अत्यंत महत्त्व है I
पद्मावती माता की आराधना से समस्त रुके हुए कार्य सिद्ध होने लगते है I
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माँ सच्चाई माता

श्री सच्चियाय माता जी की आराधना शैव, वैष्णव, शाक्त एवं जैन सभी लोग श्रद्धा से करते है I यह जैन ओसवालों की कूलदेवी है I

सच्चियाय माता की मूल प्रतिमा ओसियाजी (राजस्थान) में स्वयंभू अपने आप पहाड़ी पर प्रकट हुई थी इसलिए यह एक शक्तिपीठ है I

जैसा माताजी के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इलके दरबार में माँ समक्ष जो भी मनोकामना रखी जाती है वह सच हो जाती है इससे भी माता का नाम सच्चियाय माता है I माता के चमत्कारों का उल्लेख " मूंहता नैणसी री ख्यात" ग्रन्थ में उल्लेख मिलता है I

माता के जूडी एक प्राचीन कथा भी है कि लगभग ३००० वर्ष पूर्व परमार वंश के उत्पलदेव ने सच्चियाय माता का साक्षात् परचा देख कर माता के मन्दिर का निर्माण करवाया था I ऐसी मान्यता है कि सच्चियाय माता का मूल स्वरुप महिषासुर मर्दिती का है और नवरात्र में जो भक्त माता का श्रद्धा से नवरात्र व्रत करता है, दर्शन करता है उसके समस्त कष्टों का निवारण माँ स्वयं करती है I

कष्टों को हटने वाली एवं भक्तों की बिगड़ी बनाने वाली सच्चियाय माता सभी भक्तों का मंगल करणी है I
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श्री भगवान गणपती

जैसा हम सभी को विदित है कि भगवान गणपती को प्रथम पुज्य कहा जाता है किसी शुभ कार्य में भगवान गणपती का स्मरण पूजन करना अति आवश्य है यदि इनके स्मरणपूजन के बीना प्रारम्भ किया गया कार्य शुभ फल नहीं होता है I
"आदो गणपती वन्दे विघ्ननाशं विनायकम्"
भगवान गणपती वन्दन करने मात्र से समस्त विघ्नों का नाश होता है I
याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय के २९२ श्लोक में कहा गया है एकं विनायकं पूज्य ग्रहा शचैव विधानत: I
कर्मणा फलमाप्नोति श्रिय माप्नोत्यनुतमाम् II
जब भी भगवान गणपती की प्रथम पूजन करके विधि पूर्वक नवग्रह पूजन करने से समस्त कार्यो का शुभ फल प्राप्त होता है तथा लक्ष्मी की भी प्राप्ति होती है I
गणेश पुराण में भी यही उल्लेख है कि शुभाशुभे लौकिक वैदिके च: त्वमर्चनीय: प्रथम प्रयत्नात् II
प्रयत्न करके सर्व प्रथम गणेश पूजन ही सर्व प्रथम कर के ही दुसरे देवों का पूजन करना चाहिए I भगवान गणपती के पूजन ऋदि अर्थात वृद्धि, धन वृद्धि, वंश वृद्धि, सदबुद्धि कि वृद्धि और सिद्धि सर्व कार्य में सिद्धि प्राप्त होती है I
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श्री सोनाना खेतलाजी

यह एक भेरुजी का मंदिर है I जो कि कूलदेवता के रूप में पूजा जाता है I यहाँ पर काला गोरा भेरुजी के साथ श्री गणेश जी भी है I इनके साथ शक्ति स्वरूपा माँ ब्रह्माणी विराजमान है I इतिहास के अनूसार भगवान शिवजी ने काशी की रक्षा के लिए भैरव स्वरुप में स्वयं के कैश से अवतरित हुए I शिवजी के अशांवतार होने के कारण ये माताजी के लाल (बेटा) कहलाए I काशी की रक्षक होने के कारण इनको काशी के कोटवाल भी कहते है I

इतिहास के अनूसार करीब १८०० साल पहले काशी से काला गौरा भेरुजी श्री गणेशजी और माँ ब्रह्माणी मण्डोर जोधपुर में आकर विराजमान हुए जो आज भी इनकी बड़ी गादी कहलाती है I यहाँ आकर यहाँ के लोगो की एवं उनके क्षेत्र (खेत) की रक्षा की जिस कारण इनका नाम क्षेत्रपाल एवं खेतलाजी पड़ा I उसके बाद करीब १२०० साल पहले मण्डोर से सोनाना आए I और सोनाना से सारगवास आए I जहाँ उनके साथ (काला भेरुजी, गौरा भेरुजी, सहित ५२ भेरुजी, गणेशजी, हनूमानजी एवं माँ ब्रह्माणी ) की पूर्णशक्ति के साथ विराजमान हुए जो कि सोनाना खेतलाजी के नाम से विख्यात है I क्षेत्र के रक्षक क्षेत्रपाल होने के कारण इनको कूलदेवी के साथ कूलदेवता के रूप में पूजा जाता है I