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Mahalaxmi Mata

Mahalaxmi Mata

This shrine or Ashapura is steeped in antiquity as far as its origin is concerned. There are references to this goddess in the Puranas, Rudrayamal Tantra and so on which are all said to point to this shrine in Kutch. Be that as it may, today there is no trace of any ancient records or writings which give any indications of the beginning of worship at this shrine amongst the existing records in the possession of the trust. One fact firmly stands out that this deity was very much there in 9th century AD when the Samma clan of Rajputs from Sindh first entered western, or more correctly, north-western Kutch. They were followed in the later centuries by more families or this clan which eventually established them in the region and one of their line got control of the whole state of Kutch in the beginning of the 16th century. This was Khegarji I, the son of Jam Hamirji who was murdered by Jam Rawal earlier. Both the Jams (in Sindh a Raja or Chieftain was called ‘Jam’) were profound devotees of Ma Ashapuraji.
Amba Mata

Amba Mata

This shrine or Ashapura is steeped in antiquity as far as its origin is concerned. There are references to this goddess in the Puranas, Rudrayamal Tantra and so on which are all said to point to this shrine in Kutch. Be that as it may, today there is no trace of any ancient records or writings which give any indications of the beginning of worship at this shrine amongst the existing records in the possession of the trust. One fact firmly stands out that this deity was very much there in 9th century AD when the Samma clan of Rajputs from Sindh first entered western, or more correctly, north-western Kutch. They were followed in the later centuries by more families or this clan which eventually established them in the region and one of their line got control of the whole state of Kutch in the beginning of the 16th century. This was Khegarji I, the son of Jam Hamirji who was murdered by Jam Rawal earlier. Both the Jams (in Sindh a Raja or Chieftain was called ‘Jam’) were profound devotees of Ma Ashapuraji.
श्री सच्चाई माता

श्री सच्चाई माता

श्री सच्चियाय माता जी की आराधना शैव, वैष्णव, शाक्त एवं जैन सभी लोग श्रद्धा से करते है I यह जैन ओसवालों की कूलदेवी है I

सच्चियाय माता की मूल प्रतिमा ओसियाजी (राजस्थान) में स्वयंभू अपने आप पहाड़ी पर प्रकट हुई थी इसलिए यह एक शक्तिपीठ है I

जैसा माताजी के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इलके दरबार में माँ समक्ष जो भी मनोकामना रखी जाती है वह सच हो जाती है इससे भी माता का नाम सच्चियाय माता है I माता के चमत्कारों का उल्लेख " मूंहता नैणसी री ख्यात" ग्रन्थ में उल्लेख मिलता है I

माता के जूडी एक प्राचीन कथा भी है कि लगभग ३००० वर्ष पूर्व परमार वंश के उत्पलदेव ने सच्चियाय माता का साक्षात् परचा देख कर माता के मन्दिर का निर्माण करवाया था I ऐसी मान्यता है कि सच्चियाय माता का मूल स्वरुप महिषासुर मर्दिती का है और नवरात्र में जो भक्त माता का श्रद्धा से नवरात्र व्रत करता है, दर्शन करता है उसके समस्त कष्टों का निवारण माँ स्वयं करती है I

कष्टों को हटने वाली एवं भक्तों की बिगड़ी बनाने वाली सच्चियाय माता सभी भक्तों का मंगल करणी है I

श्री पद्मावती माता

श्री पद्मावती माता

श्री मार्कण्डेय पूराण के दुर्गा सप्तशती में उल्लेख मिलता है
ॐ नागाधीश्वर विष्टशं फणिफणों तसोरुरत्नावली
भास्वदेहलता दिवाकरनि भां नैत्र त्रयोद् भासिताम् I
माला कुम्भ कपाल नीरजकशं चन्द्रार्ध चूडां पशं
सर्वज्ञेश्वर भैरवाकं निलयां पद्मावतीं चिन्तये II

जो देवी नागराज के आसान पर विराजमान है नागों के फणों से सुशोभित होने वाली मणियों की विशाल माला से उद्भासित है I सूर्य के समान उनका तेजोमय मुख है तीन नैत्र वाली देवी है जिनका मुकुट अर्धचन्द्राकार है जो सर्व ज्ञेश्वर भैरव के अंक में निवास करनेवाली एवं अपने भक्तों पर उत्कर्ष देने वाली देवी को पद्मावती देवी के नाम से जाना जाता है

जीन शासन में भी शक्ति तत्त्व के रूप में पूजित देवी को पद्मावती के रूप में जाना जाता है I देवी पूराण में धूमलोचन को केवल अपने शब्द से ही भस्म करने वाली शक्ति रूप में वर्णित किया गया है I भगवती लक्ष्मी का स्वरुप भी माना गया है I विशेष रूप से द्रव्य लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए पद्मावती देवी की आराधना का अत्यंत महत्त्व है I

पद्मावती माता की आराधना से समस्त रुके हुए कार्य सिद्ध होने लगते है I
Ashapura Mata

Ashapura Mata

This shrine or Ashapura is steeped in antiquity as far as its origin is concerned. There are references to this goddess in the Puranas, Rudrayamal Tantra and so on which are all said to point to this shrine in Kutch. Be that as it may, today there is no trace of any ancient records or writings which give any indications of the beginning of worship at this shrine amongst the existing records in the possession of the trust. One fact firmly stands out that this deity was very much there in 9th century AD when the Samma clan of Rajputs from Sindh first entered western, or more correctly, north-western Kutch. They were followed in the later centuries by more families or this clan which eventually established them in the region and one of their line got control of the whole state of Kutch in the beginning of the 16th century. This was Khegarji I, the son of Jam Hamirji who was murdered by Jam Rawal earlier. Both the Jams (in Sindh a Raja or Chieftain was called ‘Jam’) were profound devotees of Ma Ashapuraji.
श्री भगवान गणपती

श्री भगवान गणपती

जैसा हम सभी को विदित है कि भगवान गणपती को प्रथम पुज्य कहा जाता है किसी शुभ कार्य में भगवान गणपती का स्मरण पूजन करना अति आवश्य है यदि इनके स्मरणपूजन के बीना प्रारम्भ किया गया कार्य शुभ फल नहीं होता है I

"आदो गणपती वन्दे विघ्ननाशं विनायकम्"

भगवान गणपती वन्दन करने मात्र से समस्त विघ्नों का नाश होता है I
याज्ञवल्क्य स्मृति के आचाराध्याय के २९२ श्लोक में कहा गया है एकं विनायकं पूज्य ग्रहा शचैव विधानत: I
कर्मणा फलमाप्नोति श्रिय माप्नोत्यनुतमाम् II

जब भी भगवान गणपती की प्रथम पूजन करके विधि पूर्वक नवग्रह पूजन करने से समस्त कार्यो का शुभ फल प्राप्त होता है तथा लक्ष्मी की भी प्राप्ति होती है I

गणेश पुराण में भी यही उल्लेख है कि शुभाशुभे लौकिक वैदिके च: त्वमर्चनीय: प्रथम प्रयत्नात् II

प्रयत्न करके सर्व प्रथम गणेश पूजन ही सर्व प्रथम कर के ही दुसरे देवों का पूजन करना चाहिए I भगवान गणपती के पूजन ऋदि अर्थात वृद्धि, धन वृद्धि, वंश वृद्धि, सदबुद्धि कि वृद्धि और सिद्धि सर्व कार्य में सिद्धि प्राप्त होती है I